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आपातकाल जरुरी है। Emergency is essential.

दिल्ली की हवा गन्दी तो हुई है, बिलकुल हुई है। मैं इस बात से वाकिफ हूँ,लेकिन इस हवा ने जर्नलिज्म को भी गन्दा किया है। जर्नलिज्म, शुद्ध, पवित्र तो ये सदा से ही नहीं रही. परन्तु इसमें प.म. २.५ जैसे कणों के मिलने के बाद और भी मैली हो गयी है, और इनका मकसद भी इसी बीच कहीं गुम सा हो गया है।  लोगों को अब बहला – फुसला कर  जैसे एक नेता अपने वोट बटोरता है वैसे ये अपने व्यूअर बटोर रहे है। उनकी सहानुभूति के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है।  इसी बीच जनता जिसको इसकी निहायत जरूरत है, वो भी पिसी जा रही है।  आलोचना , व् लाल छन का मंजर सा छीर चूका है।  अगर  आप सरकार के सही काम की भी तारीफ कर दे, तो आपको भक्त, चमचा जैसे उम्दा शब्दों से नवाज़ा जायेगा और अगर वास्तविक गलत मालूम हो रही चीज़ को थोड़ा नकार दे, तो आपको एंटी-नेशनल, टेररिस्ट सुनने को मिलेगा।

जौर्नालिस्म का  तो यह आलम है, की  सेंसेशन से भी उठ, या युँ कह गिर कर  घिनौने कगार  पर पहुँच चूका है। लोग इनके बातों में आ के ये भूल जाते है की , जैसे अथॉरिटी पर सवाल उठाने का हक़ इन्हें है।  तो अथॉरिटी को भी इनसे सवाल करने की जरूरत है।  अगर आप एक से भी  यह हक़ छीनते है तो दूसरा हमारे  समाज को विनाश की ओर अग्रसर करता है।  अगर संवेदनशील, गुप्त जानकारी जिससे देशहित का नुकसान हो या मातृभूमि को संकट हो, और लोगों को यह आपतकाल लगे तो यह आपातकाल जरूरी है।  यह  तबतक जरूरी है जब तक लोग  अपने विचारधारा को एक दिशा न दें दे।  दूसरों की बात में आने से पहले एक बार खुद उस विषय पर खुद परामर्श न कर ले। अब जरूरत है आत्मचिंतन की और खुद से सवाल करने की; ये कैसी पत्रकारिता है ?

 

I know Delhi’s air has been polluted, extremely polluted, But the wind was so messy it’s also affected journalism. Journalism have never been flawless either, contaminated with various issues always. Period. But now, it’s also losing motive and importance in his own chaos. Using silver tongue over fickle minded people, irony, Isn’t it? But this tactic of a leader also emanated the journalist, and people are suffering amid both. Apart, the indecision arose between good and bad karma of government, Vomiting any views over it, Capische !, Awards and title were fixed already. Anti- national and Bhakta are few of them.

Journalism has its own song, From the motive to get freedom for India, Yellow journalism and now this. It’s already set a milestone. Amid people forgot if they have power to challenge authority. The authority has same and believe me on this, making any of them omnipotent and the society march towards destruction. If a sensitive information leads to loss for country, and you call an action emergency, well then emergency is needed. It is needed until people start mobilizing their opinion into a bigger cause for nation’s sake. It’s needed until people lose their nature of being persuaded, and think. It’s necessity to introspect and answer; what kind of journalism we are pursuing?


Shubham Bharti

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Author:

Freelance Writer/ Blogger, Production & Journalism Student, Bachelor in Mass Communication - Guru Jambheshwar University

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